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सुप्रीम कोर्ट में राज्यपालों की मंजूरी की डेडलाइन पर सातवें दिन बहस, जानिए पूरा मामला

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Posted On:Wednesday, September 3, 2025

मुंबई, 03 सितम्बर, (न्यूज़ हेल्पलाइन)। विधानसभाओं से पास हुए बिलों पर राष्ट्रपति और राज्यपाल की मंजूरी को लेकर समयसीमा तय करने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में लगातार सातवें दिन बुधवार को सुनवाई हुई। इस दौरान पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश की सरकारों ने राज्यपालों की उस शक्ति का विरोध किया जिसके तहत वे बिलों को रोककर रखते हैं। राज्यों का कहना था कि कानून बनाना पूरी तरह विधानसभा का अधिकार है और इसमें राज्यपाल की कोई सक्रिय भूमिका नहीं होती। वे केवल औपचारिक प्रमुख हैं।

राज्यों ने दलील दी कि केंद्र सरकार अदालत की ओर से तय की जाने वाली डेडलाइन का विरोध करके संविधान की मूल भावना को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। चीफ जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की बेंच ने सुनवाई की। कोर्ट ने मंगलवार को ही टिप्पणी की थी कि गवर्नर बिलों को अनिश्चित समय तक लंबित नहीं रख सकते। मामले की अगली सुनवाई 9 सितंबर को होगी। पश्चिम बंगाल की ओर से कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर विधानसभा से पास बिल गवर्नर के पास जाता है तो उन्हें उस पर हस्ताक्षर करना ही होगा या फिर उसे राष्ट्रपति के पास भेजना होगा। लगातार रोके रखना संविधान और लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है। हिमाचल प्रदेश सरकार के वकील आनंद शर्मा ने कहा कि संघीय ढांचा भारत की ताकत है और यह संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा है। अगर गवर्नर बिलों को रोकते हैं तो इससे केंद्र और राज्यों के बीच टकराव बढ़ेगा और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर असर पड़ेगा।

कर्नाटक सरकार की ओर से पेश वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने दलील दी कि राज्य में दोहरी सरकार की व्यवस्था नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि गवर्नर हमेशा मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही काम करने के लिए बाध्य हैं। उन्हें सिर्फ दो स्थितियों में विवेकाधिकार मिला है—एक, जब वे अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजते हैं और दूसरा, जब कोई बिल हाईकोर्ट की शक्तियों को प्रभावित करता है। इन दोनों परिस्थितियों को छोड़कर गवर्नर के पास स्वतंत्र अधिकार नहीं है। केंद्र सरकार ने अदालत में यह तर्क दिया कि राज्य सरकारें इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट नहीं आ सकतीं, क्योंकि राष्ट्रपति और राज्यपाल के फैसले न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर हैं। वहीं मई में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी सुप्रीम कोर्ट से सवाल किया था कि क्या अदालत राज्यपालों और राष्ट्रपति को बिलों पर निर्णय लेने के लिए समयसीमा तय कर सकती है।


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