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‘सामना’ के संपादकीय से फिर बढ़ा सियासी तापमान, राउत ने बीजेपी पर साधा निशाना

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Posted On:Wednesday, December 10, 2025

शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में प्रकाशित संजय राउत के ताज़ा संपादकीय ने एक बार फिर दिल्ली से लेकर मुंबई तक राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर बीजेपी द्वारा आयोजित समारोह पर सवाल खड़े करते हुए राउत ने बीजेपी को “वंदे मातरम् का ठेकेदार” बता दिया। राउत के अनुसार, बीजेपी राष्ट्रवाद को राजनीतिक उपकरण की तरह इस्तेमाल कर रही है, जबकि स्वतंत्रता संग्राम की असली धड़कन कांग्रेस और क्रांतिकारी आंदोलन रहे हैं।

वंदे मातरम् कार्यक्रम पर तीखा हमला

संपादकीय में कहा गया है कि संसद में ‘वंदे मातरम्’ पर चर्चा शुरू करवाकर बीजेपी ने खुद राजनीतिक संकट तैयार किया। जैसे ही यह मुद्दा उठा, विपक्ष ने एक सुर में सरकार पर हमला बोल दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर यह आरोप लगाया कि वे राष्ट्रवाद को “चुनावी मुनाफे का हथियार” बना चुके हैं। राउत लिखते हैं कि आज़ादी के प्रतीकों को सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए उछालना, देश भावना का सम्मान नहीं बल्कि उसका उपयोगवादी प्रदर्शन है।

“स्वतंत्रता संग्राम में बीजेपी का कोई योगदान नहीं” – राउत

संपादकीय का सबसे तीखा हिस्सा वह है जिसमें राउत ने कहा कि बीजेपी और संघ परिवार का स्वतंत्रता आंदोलन से कोई सीधा रिश्ता नहीं रहा। राउत के शब्दों में—“इनके शरीर पर स्वतंत्रता संग्राम की खरोंच तक नहीं आई, फिर भी राष्ट्रवाद पर ज्ञान बांटने का अधिकार इन्होंने स्वयं घोषित कर लिया।” उन्होंने याद दिलाया कि 1896 में जब रवींद्रनाथ टैगोर ने कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार ‘वंदे मातरम्’ गाया, तभी यह गीत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा बन गया था।

कांग्रेस को श्रेय, बीजेपी पर सवाल

राउत का दावा है कि जिस कांग्रेस ने ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय आंदोलन की पहचान दी, आज उसी कांग्रेस से देशभक्ति का प्रमाण पत्र मांगा जा रहा है।
संपादकीय में सवाल उठाया गया कि:

  • क्या राष्ट्रवाद सिर्फ बीजेपी की निजी संपत्ति है?

  • क्या आज़ादी का संघर्ष केवल उन दलों का है जो 1947 के बाद बने?

उनका आरोप है कि बीजेपी के पूर्वज आज़ादी के समय अंग्रेजों और मोहम्मद अली जिन्ना के साथ खड़े थे, न कि जेलों में या फांसी के तख्तों के नीचे।

RSS शाखाओं में ‘वंदे मातरम्’ कब से?

राउत ने संघ परिवार से यह भी पूछा कि यदि ‘वंदे मातरम्’ इतना प्रिय है, तो:

  • इसे RSS शाखाओं में पहली बार कब गाया गया?

  • फिर शाखाओं में “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि” ही मुख्य गीत क्यों बना रहा?

उनका इशारा यही था कि राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत की भावनाओं का वास्तविक सम्मान कांग्रेस और क्रांतिकारी आंदोलनों ने किया, न कि वर्तमान राजनीतिक संगठनों ने।

मोदी पर व्यंग्य, प्रियंका का संदर्भ

राउत ने व्यंग्य करते हुए लिखा कि प्रधानमंत्री मोदी हर राजनीतिक तर्क का अंत नेहरू पर आरोप लगाकर करते हैं। संपादकीय में प्रियंका गांधी के संसद में दिए बयान को भी शामिल किया गया, जिसमें उन्होंने कहा था:“जितने साल मोदी प्रधानमंत्री रहे, उससे ज्यादा साल पंडित नेहरू आज़ादी की लड़ाई में जेल में रहे।”

बढ़ती समस्याओं पर नहीं, बहस राष्ट्रवाद पर

संपादकीय का अंतिम संदेश सीधे सरकार पर वार करता है।
राउत ने लिखा कि:

  • बेरोजगारी रिकॉर्ड स्तर पर

  • महंगाई घर–घर में बोझ

  • महिला सुरक्षा और हवाई सेवाओं की संकट स्थिति

  • किसानों और युवाओं की समस्याएं विकराल

इसके बावजूद सरकार ‘वंदे मातरम्’ पर बहस में उलझी हुई है, विकास, अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा पर नहीं।

क्रांतिकारियों की कुर्बानी का संदर्भ

अंत में राउत ने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में कहा:

  • भगत सिंह

  • अशफाक उल्लाह खान

  • खुदीराम बोस

  • चंद्रशेखर आज़ाद

इन सभी ने ‘वंदे मातरम्’ बोलते हुए फांसी और गोलियां झेली थीं, लेकिन राउत के शब्दों में—“उस कतार में बीजेपी का एक भी पूर्वज नहीं था।”


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